नेपाल में जलप्रलय के बाद एक और खतरा: 469 मौतें, 1,500 से ज्यादा लापता; मलबे से बनी झील ने बढ़ाई चिंता

काठमांडू/रसुवा, नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड अब सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि लगातार बदलते खतरे में बदल गई है। नेपाल-चीन सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्र में अचानक आई बाढ़ ने घरों, सड़कों, पुलों, बिजली परियोजनाओं और सीमा से जुड़े महत्वपूर्ण ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है। राहत और बचाव अभियान जारी है, लेकिन मलबे के कारण बनी एक विशाल अस्थायी झील के ओवरफ्लो होने से प्रभावित इलाकों में दोबारा बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है।नेपाल पुलिस के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार नेपाल में मृतकों की संख्या 469 तक पहुंच गई है, जबकि बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं। चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी मौतें और सैकड़ों लोगों के लापता होने की सूचना है। अलग-अलग समय पर अपडेट होने के कारण विभिन्न रिपोर्टों में आंकड़े बदल रहे हैं; इसलिए लापता लोगों की संख्या को फिलहाल 1,500 से अधिक बताया जा रहा है।
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इस त्रासदी की शुरुआत हिमालय के ऊंचाई वाले इलाके में बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के टूटकर नदी तंत्र में गिरने से जुड़ी बताई जा रही है। इससे अचानक भारी मात्रा में पानी, पत्थर, कीचड़ और मलबा नीचे की ओर आया और नदी का सामान्य प्रवाह बेहद कम समय में विनाशकारी बाढ़ में बदल गया।वैज्ञानिक आकलनों में हिमनदों और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बढ़ते तापमान तथा जलवायु परिवर्तन को भी ऐसे खतरों को बढ़ाने वाले संभावित कारकों में शामिल किया गया है। हालांकि घटना के सटीक भूगर्भीय कारणों का आकलन अभी जारी है।
विनाश के बावजूद राहत अभियान में बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित निकाला गया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार नेपाल में 3,200 से अधिक लोगों को रेस्क्यू किया जा चुका है। नेपाली सेना, पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियां हेलीकॉप्टरों और जमीनी माध्यमों से राहत अभियान चला रही हैं।लेकिन तबाही ने अभियान को बेहद मुश्किल बना दिया है। कई पुल और सड़कें बह चुकी हैं, जबकि करीब 40 किलोमीटर तक सड़क संपर्क प्रभावित होने की रिपोर्ट है। पहाड़ी भूगोल, खराब मौसम और लगातार बदलती जलधारा के कारण कई इलाकों तक पहुंचना अभी भी चुनौती बना हुआ है।
यह त्रासदी नेपाल के स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं है। प्रभावित क्षेत्र पर्यटन, ट्रेकिंग और कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। इसलिए भारत समेत कई देशों के नागरिकों के संपर्क से बाहर होने की खबर है। AP के अनुसार 30 से ज्यादा देशों के नागरिकों के लापता होने की सूचना सामने आई है। रिपोर्ट में 288 भारतीय नागरिकों के संपर्क में नहीं होने की जानकारी दी गई है। अमेरिका, मलेशिया, यूक्रेन, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन समेत कई देशों के नागरिक भी लापता लोगों में शामिल हैं। भारत में भी अलग-अलग राज्यों ने नेपाल में फंसे अपने नागरिकों का पता लगाने के लिए अभियान तेज किया है। तमिलनाडु के कुछ यात्रियों को रेस्क्यू कर काठमांडू पहुंचाया गया है और उनकी भारत वापसी की प्रक्रिया शुरू हुई है।
बाढ़ ने नेपाल के जलविद्युत ढांचे को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। त्रिशूली क्षेत्र की एक हाइड्रोपावर परियोजना की सुरंग में फंसे लोगों को निकालने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया गया। रिपोर्टों के अनुसार सैकड़ों मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाला गया है, हालांकि कुछ अन्य परियोजनाओं में अब भी लोगों के फंसे होने की खबरें सामने आई हैं।
कई देशों ने नेपाल को खोज एवं बचाव दल भेजने की पेशकश की है। हालांकि नेपाल सरकार का कहना है कि उसकी अपनी सुरक्षा एजेंसियां फिलहाल बचाव अभियान संभालने में सक्षम हैं। अमेरिका समेत अन्य देशों की ओर से सहायता की पेशकश की गई है।
यह सिर्फ नेपाल की त्रासदी नहीं, हिमालय के बदलते खतरे का संकेत
नेपाल की यह घटना एक बड़ा सवाल भी छोड़ रही है—क्या हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर, बर्फ और पहाड़ी ढलानों से जुड़े अचानक आने वाले खतरों के लिए मौजूदा आपदा-प्रबंधन व्यवस्था पर्याप्त है?
वैज्ञानिकों ने ऊंचे हिमालय में तापमान बढ़ने और ग्लेशियरों के अस्थिर होने को लेकर लंबे समय से चिंता जताई है। इस घटना में भी बर्फ, चट्टान, मलबे और पानी के अचानक एक साथ नीचे आने से तबाही कई गुना बढ़ गई।
फिलहाल नेपाल के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ मलबे में दबे और लापता लोगों की तलाश, दूसरी तरफ उस अस्थायी झील से पैदा हो रहे नए फ्लैश फ्लड के खतरे से हजारों लोगों को बचाना। सबसे बड़ी चिंता यही है कि पहली बाढ़ की तबाही के बाद कहीं दूसरी बाढ़ नया संकट न खड़ा कर दे।